Monday, 11 May 2015

प्रिय आदरणीय मोदी जी,

जल्द ही आपकी सरकार 1 वर्ष पूर्ण करने जा रही है। निश्चित ही आपके सत्ता के शिखर पर आगमन से देश में एक नयी आशा ऊर्जा का प्रादुर्भाव हुआ है। यदा कदा कुछ अच्छे spells (अवधियों) को छोड़कर 67 वर्षों के निराशाजनक राजनीतिक दौर के बाद बड़ी उम्मीद से जनता ने आपके अनेक गुणों को सराहते हुए, जैसे कि प्रभावशाली नेतृत्व, वाकपटुता, मौलिक सोच, साधारण पृष्ठभूमि, देशभक्ति और देश को दुनिया के शीर्ष पर ले जाने के जज्बे को देखते हुए कई दशकों के बाद पूर्ण बहुमत की सरकार का प्रधान मंत्री बनाया है। अभी भी लोग बड़ी उम्मीद से आपकी ओर देख रहे हैं। 

1 वर्ष बाद अब समय है कि आत्म विश्लेषण किया जाये और जरुरत हो तो मार्ग परिवर्तन (कोर्स करेक्शन) बिना किसी संकोच के किया जाये। 

विश्लेषण 
सर्वप्रथम प्राथमिकता तय होनी चाहिये। अभी तक अक्सर यह हुआ है कि सरकार के निर्णयों का केंद्र बिंदु उद्योगपति, बिल्डर्स, नेता  अन्य बड़े बड़े लोग रहे हैं। इसीलिये दुनिया भर के बड़े लोगों में हमारा अच्छा ख़ासा प्रतिनिधित्व भी है, जो लगातार बढ़ता भी जा रहा है। शायद अवधारणा यह रही है कि इनके विकास का लाभ नीचे के तबके तक रिसेगा/टपकेगा। ये सच से पर है, या यूँ कहें कि रिसता तो है पर गरीबों का विकास हो सके उतना नहीं। होता यह है कि इस रिसाव से गरीब अगर 1 कदम आगे बढ़ता है तो चंद बड़े लोग 10 से 100 कदम बढ़ चुके होते हैं। सामाजिक खाई और भी बड़ी हो जाती है। खाने पीने के सामान से लेकर सम्मानित स्कूलों की फीस बड़े और बमुश्किल मध्यम वर्ग के अनुसार बढ़ जाती हैं, जिससे गरीब और गरीब होकर रह जाता है। हाँ, सरकारें कई तरह की schemes, अनुदान देकर, जो सभी तक पहुँच भी नहीं पाती हैंगरीबों को राहत देने की कोशिश भी करती हैं। पर इस अनुकम्पा से उनका आत्मविश्वास, self respect, आगे बढ़ने की चाहत, प्रतिस्पर्धा करने का जज्बा आने पीढ़ी को प्रोत्साहित करने का साहस डगमगा कर रह जाता है। मानव संसाधन किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति होती है। जहाँ 70% लोग साधारण जीवन जीने की जद्दोजहत में ही पूरा जीवन व्यतीत कर देते हों वहाँ प्रगति की आशा करना महान भूल होगी। 

समाधान 
हमारी नीतियाँ जन साधारण को ध्यान में रखकर बननी चाहिये। कुछ खास पहलू जिन पर ध्यान दिया जाये तो आम आदमी स्वतः ही, बिना किसी सरकारी सहायता केसशक्त  समृद्ध हो सकेगा और केवल सम्मानित जीवन पा सकेगा बल्कि देश हित में महत्वपूर्ण योगदान कर सकेगा। 

जवाबदेही : अभी सरकारी नौकरी (खास तौर पर राजस्व, पुलिस, टैक्स अधिकारी जैसे ताकतवर ओहदों वाली) नौकरशाहों को राजा बना देती हैं। उनकी तन्खा केवल दफ्तर तक आने के लिये होती है। उसके बाद हर काम की कीमत वसूली जाती है। और इसीलिये अधिकाधिक फैसले गलत होते हुए भी गलत लोगों के पक्ष में होते हैं क्योंकि ऐसे लोग स्वाभाविक रूप से अधिक कीमत देने को तैयार रहते हैं। बल्कि ऐसे अनुभवों से उन्हें और भी अधिक अनैतिक या भ्रष्ट कार्य करने का बढ़ावा मिलता है। आम लोग कोर्ट की (लम्बी) लड़ाई लड़ने में आर्थिक, समयाभाव या अन्य कारणों से अक्षम होते हैं। फिर भी अगर कभी किसी नौकरशाह की दुस्साहसी मुखर गलती सामने भी जाती है तो भी लगभग निरपवाद रूप से नौकरशाह सुरक्षित छूट जाता है। यह जल्द से जल्द ठीक करने की आवश्यकता है। चूँकि नौकरशाह ही कानून बनाने में आपकी मदद करते हैं स्वाभाविक रूप से वे इस सिस्टम में कोई बदलाव नहीं लाना चाहते। पर आप मानेंगे अगर आप (राजनेताओं) में इच्छाशक्ति हो तो मुश्किल नहीं है, हो सकता है। (चाहें, तो सुझाव दिये जा सकते हैं।)

मुआवजा व्यवस्था : सच है किसानों या अन्य कुदरत आधारित लघु व्यवसायियों को मुश्किल समय में मदद की आवश्यकता होती है। परन्तु यह सरकारों का काम नहीं हो सकता। इससे बाबुओं में रिश्वत खोरी को बढ़ावा मिलता है, भाई बंदी होती है, वास्तविक यथास्थिति जांचने के बजाए सुनी कही और ज्यादा फायदेमंद रिपोर्टिंग करने की स्थिति बनती है। अति महत्वपूर्ण बात यह भी है कि सम्बंधित विभाग के नियमित काम अस्त-व्यस्त बल्कि बुरी तरह रुक कर रह जाते हैं। होना यह चाहिये की इनका बीमा कराया जाये, जिसका अंश (say 50%) सरकारें दें। अंततः यह राशि हर वर्ष दिये जाने वाले मुआवजों से कम ही रहेगी। जहाँ यह विपदा से आहत लोगों को राहत देगा, यह बीमा सेक्टर को नयी ऊँचाइयों तक ले जाकर अनेकों नौकरियों का सृजन भी करेगा, बाबुओं को कारगर रूप से शिकायत निवारण कर सकने तक ही लिप्त करेगा ताकि अन्य काम निर्बाध रूप से चलते रहें।

सही हुनर सही जगह : इसे एक उदहारण से बताना चाहूंगा। बिल्डिंग निर्माण क्षेत्र में हम पाते हैं कि लगभग बिना किसी अपवाद के अधिकतर बिल्डर्स वे लोग होते हैं जो तकनीकी तौर पर अशिक्षित होते हैं और केवल धन बल और बाहुबल से इस सेक्टर पर दबदबा बना कर मनमानी करते रहते हैं। नीति के तहत सरकार उन प्रोफेसर्स या पेशेवर इंजीनियर्स को प्रोत्साहन क्यों नहीं देती जो 10-20 साल का अनुभव और पेंशन हासिल करने के बाद इस क्षेत्र में उद्यमी की तरह आना चाहते हों। इससे बेहतर गुणवत्ता, बेहतर प्रबंधन और बेहतर कीमत नियंत्रण हो सकेगा। 

वैश्विक दृष्टिकोण : यह सच है कि दुनिया का ध्यान आकर्षित करने जैसी कुछ महान उपलब्धियों के अपने आर्थिक फायदे हैं, परन्तु उससे भी अधिक सत्य यह है कि राष्ट्र की 70% गरीब जनता को स्वाबलंबी बनाकर और जवाबदेह व्यवस्था बनाकर उन सबका योगदान लेकर आगे बढ़ा जाये। वही Inclusive Growth होगी जहाँ समस्त मानव संसाधन को रचनात्मक रूप से विकास में शामिल किया जा सकेगा। 

वादों की प्रगति : चुनावों के दौरान स्वाभाविक तौर पर सभी पार्टियों की तरह आपने भी अनेक वादे किये थे। आपकी वाक् शैली और गुजरात मॉडल पर भरोसा कर जनता ने यकीन भी किया। साल भर बाद देश आशा करता है कि आप स्वयं सरकार के मुख्य कार्यकर्ता जनता की मुख्य उम्मीद के तौर पर कम से कम उन कुछ वादों की प्रगति पर कुछ बतायें (MMS जी की तरह मौन रखेंजो आपको एक अप्रत्याशित जीत दिलाने में सहायक हुए। जैसे :-

()    काला धन : 400 लाख करोड़? हर परिवार को 15 लाख(?Of Course जुमला था?) कुछ पता चला, कुछ प्रगति, कुछ आया

()    भ्रष्टाचार निर्मूलन के लिए नागरिकों प्रशासन के बीच कार्य प्रणाली में मनमानी के अवसर समाप्त करना : आम जनता आपको तो सुनती रहती है। कभी सीधे जनता से मिलकर बात करें तो आप पायेंगे सारा तंत्र वैसे ही चल रहा है जैसा UPA के समय था- निर्भीक, निर्लज्ज, आम जनता का दुश्मन सेठो/ठेकेदारों का हिमायती। क्या हुआ? क्या मुश्किल है? दामादजी निश्चय ही आपकी जीत में बहुत सहायक हुये, जनता को लगा Mighty और Powerful लोग भी गुनाह के लिये बख्शे नहीं जायेंगे। हरयाणा ने भी आपकी पार्टी बीजेपी को ही चुना पर ....  

()    रेल सुधार / बुलेट रेल : आते ही 14 % किराये बढ़ोतरी से आशा बानी थी कि महँगी ही सही रेल और उसमें सुरक्षा बेहतर होगी। आये दिन रेल में लूट पाट के समाचार सुरक्षा के बारे में तो बता ही रहे हैं, लेट चलना बेरोकटोक बरक़रार है। ट्रेनों का बार बार cancellation बढ़ा ही है - मुंबई (अलाहाबाद) howrah मेल जैसी train 1 हफ्ते में 2 बार cancel होना किसी सुधार का परिचायक तो नहीं हो सकता। उन हज़ारों यात्रियों पर क्या बीतती होगी जो महीनों पहले रिजर्वेशन कराकर पाते हैं कि ठीक चलने के समय train cancel हो गयी है। अनेकों की ऐसी cancelled यात्रा शायद उनकी विदेश भ्रमण, प्रवेश परीक्षा, Job Interview या चिकित्स्कीय appointments को प्रभावित करती होगी जो अत्यन्त निंदनीय तो है ही और रेलवे की दुर्दशा बताता है। लाखो करोड़ों लोगों को जहाँ basic रेल सुविधा का इतना बुरा हाल है, कुछ हज़ारों के लिये बुलेट ट्रैन की बात करना क्या जल्दबाज़ी नहीं लगती?

()     व्यवस्थागत सुधार - फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट अदालतों की संख्या दुगनी करनाकारगर न्याय व्यवस्था : बेशक हमारे न्यायालय अभी भी काफ़ी ईमानदार हैं और देश हित में विशेष भूमिका निभा सकते हैं। आज न्याय के लिये सालों का इंतज़ार, विशेषकर ताकतवर लोगों के सम्बन्ध में, न्याय नकारने जैसी बात है। और शायद यही अनेक विषमताओं और अनियमतताओं की जड़ भी है। अगर एक गुनहगार दशकों तक नेता, बल्कि मंत्री, जैसे अहम पद के फायदे उठाने और दुरूपयोग करने के बाद गुनहगार सिद्ध हो भी जाता है तो क्या ये न्यायोचित होगासिद्धांततः यह ठीक हो सकता है कि जब तक गुनाह सिद्ध हो कोई गुनहगार नहीं होता, पर केवल सिद्धांततः बल्कि व्हवहारिक रूप से यह भी उतना ही सही है कि आरोपित व्यक्ति निर्णय होने तक जिम्मेदार पदों से दूर रहे। ये सरकार का (आज के सन्दर्भ में आपकाकाम है, बल्कि चुनावी वादा भी है कि फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट और अदालतें बढ़ायेंगे। कम से कम मौजूदा सुप्रीम कोर्ट के अनेकों, हाई कोर्ट के 300 से भी ज्यादा और निम्न कोर्टों के जजों के अनगिनत पदों को भरकर और कोर्टों को वांछित सुविधाएँ देकर अव्यवस्था से देश को मुक्ति दिलाएं। आशा है पैसों की कमी की बात नहीं आएगी क्योंकि न्याय के अभाव में जितना नुकसान देश सह रहा है उसके कुछ अंश में ही यह सब संभव है। जो न्यायिक व्यवस्था के अन्य सुपरिणाम मिलेंगे वो अलग। एक साल में, जोकि इस कार्य हेतु यथोचित कहा जा सकता हैइस दिशा में क्या कुछ हुआ?

अंत में, इस आशा के साथ कि कुछ तो हो रहा होगा, उम्मीद करता हूँ कि आप 1 साल पूर्ण करने के अवसर पर देश को सम्बोधित कर वस्तुस्थिति से अवगत कराएँगे। 

एक शुभचिंतक 
भारतीय 
Mob : +91-9713255369

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